Posts

Showing posts from April, 2023

जानिए किस ग्रह से कौन-सा रोग होता है ?

हर बीमारी का समबन्ध किसी न किसी ग्रह से है जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है या फिर दूसरे ग्रहों से बुरी तरह प्रभावित है। यदि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है तो आज धनवान कोई नहीं है। हर व्यक्ति के शरीर की संरचना या तासीर अलग होती है। किसे कब क्या कष्ट होगा यह तो डॉक्टर, हकीम या वैध भी नहीं बता सकता परन्तु एक सटीक ज्योतिष इसकी पूर्वसूचना दे देता है कि आप किस रोग से पीड़ित होंगे ? या क्या व्याधि आपको शीघ्र प्रभावित करेगी...  सूर्य ग्रह से रोग ========== सूर्य ग्रहों का राजा है इसलिए यदि सूर्य आपकी कुंडली में बलवान है तो आपकी आत्मा बलवान होगी। आप शरीर की छोटी-मोटी व्याधियों पर ध्यान नहीं देंगे। परन्तु यदि सूर्य अच्छा नहीं है तो सर्व प्रथम आपके बाल झड़ेंगे। सर में दर्द आए दिन होगा और आपको दर्द निवारक दवा का सहारा लेना ही पड़ेगा।  चन्द्र ग्रह से मानसिक रोग ================= चन्द्र संवेदनशील लोगों का अधिष्ठाता ग्रह होता है। यदि चन्द्र कमजोर है तो मन कमजोर होगा और आप भावुक अधिक होंगे। कठोरता से आप तुरंत प्रभावित हो जाएंगे और सहनशक्ति भी कम होगी। इसके बाद सर्दी जुकाम और खांसी कफ जैसी व्याधियों ...

क्या महाभारत के युद्ध में भी कोई सेक्युलर था?

महाभारत के युद्ध में भी एक व्यक्ति धर्म निरपेक्ष रहे हैं। जब महाभारत युद्ध के समय दुर्योधन ने नारायणी सेना मांगी तथा अर्जुन ने वासुदेव को मांगा तो बात बलराम जी पर गयी। पूछा गया कि बलराम जी किधर से युद्ध करेंगे। बलराम जी से युद्ध के बारे में पूछा गया तो उन्होंने युद्ध मे तटस्थ रहने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि दोनों तरफ मेरे अपने हैं। अर्जुन मेरा रिश्तेदार है तो दुर्योधन मेरा शिष्य है। इसलिए मैं दोनो तरफ से ही नहीं लड़ सकता क्योंकि मैं दोनो तरफ हूँ। ऐसा कहकर बलराम जी युद्ध से मुह मोड़ लिए। बस, यही वो निरपेक्षता है व्यक्ति की जो आज के समाज को खाये जा रही है। इसका परिणाम भी आपको ज्ञात होगा। महाभारत में धर्म की विजय हुई और जब भीम दुर्योधन को मार रहा था तब बलराम जी अचानक आ पहुँचे। बलराम जी दुर्योधन को बचाने लगे। अंत समय में जब बलराम जी ने अपने कायदे कानून लगाए तो श्री कृष्ण ने उनका प्रवेश निषेध कर दिया। श्री कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि जब धर्म अधर्म का युद्ध चल रहा था तब आप कहाँ थे? जब धर्म अधर्म का संघर्ष होने वाला था तब आप किसकी तरफ थे? जब धर्म स्वयं की रक्षा के लिए आपको बुला र...

कुंडली बताएगी शराबी बनने की असली वजह

शराब या किसी और तरह के नशे का आदी बनने के बाद हर व्यक्ति कहता है कि उसे बुरी संगत ने इनका आदी बना दिया, वह खुद दूर रहना चाहता था। अक्सर कोई सदमा, कोई खुशी या किसी के साथ को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। सच तो यह है ये सब व्यक्ति की कुण्डली में मौजूद ग्रहों का प्रभाव होता है। कोई व्यक्ति शराब या नशे का सेवन तभी करता है जब उसकी कुण्डली का चन्द्रमा- राहु के साथ आर्द्रा, स्वाति अथवा शतभिषा नक्षत्र में होता है। कुण्डली में राहु की अन्य स्थिति भी व्यक्ति को शराबी बनाती है। राहु अगर अपनी नीच राशि वृश्चिक में हो और चन्द्रमा पर शनि, मंगल, केतु की दृष्टि हो तो व्यक्ति को शराब की लत लग सकती है। लेकिन चन्द्रमा पर गुरू की दृष्टि होने पर व्यक्ति नशीली चीजों के सेवन से मुक्त हो सकता है। जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में राहु और शुक्र का संबंध बनता है तो व्यक्ति शराबी हो सकता है। शुक्र अगर नीच का हो तो व्यक्ति शराब एवं अन्य नशीली चीजों का भी आदी होता है। ज्योतिषशास्त्र में समस्याओं के साथ उनका समाधान भी बताया गया है। यदि शुक्र ग्रह को मजबूत और शुभ बनाएं तो नशे से मुक्ति मिल सकती है। इसके लिए शुक्रवा...

श्री गणेश की पीठ के दर्शन क्यो नही करना चाहिए ?

ऋद्धि सिद्धि के दाता यानि गणेश जी का स्वरूप बेहद मनोहर एवं मंगलदायक है। एकदंत और चतुर्बाहु गणपति अपने चारों हाथों में पाष, अंकुष, दंत और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिन्ह है। ऐसी मान्यता है कि उनके शरीर पर जीवन और ब्रहमांड से जुड़े अंग निवास करते हैं। भगवान शिव एंव आदि शक्ति का रूप कहे जाने वाली माता पार्वती के पुत्र गणेश जी के लिए ऐसी मान्यता है कि इनकी पीठ के दर्शन से घर में दरिद्रता का वास होता है इसलिए इनकी पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए। अनजाने में पीठ के दर्शन हो जाएं तो मुख के दर्शन करने से ये दोष समाप्त हो जाता है। गणेश जी के कानों में वैदिक ज्ञान, सूंड में धर्म, दांए हाथ में वरदान, बांए हाथ में अन्न, पेट में सुख समृद्धि, नेत्रों में लक्ष्य, नाभि में ब्रहमांड, चरणों में सप्तलोक और मस्तक में ब्रह्मलोक है। शास्त्रों के अनुसार जो जातक शुद्ध तन और मन से उनके इन अंगों के दर्शन करता है। उनकी धन, संतान, विद्या और स्वास्थ्य से संबधित सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इसके अलावा जीवन में आने वाले संकटों से भी छुटकारा मिलता है। सम्पूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले गणेश जी अपने भक...

कुंडली मे भूमि भवन सुख

मनुष्य जीवन की प्रमुख आवश्यकता में से एक अच्छा घर बनाने इच्छा हर किसी मे होती है। व्यक्ति किसी ना किसी तरह से जोड़-तोड़ कर के घर बनाने के लिए प्रयास करता ही है। कुछ ऎसे व्यक्ति भी होते हैं जो जीवन भर प्रयास करते हैं लेकिन किन्हीं कारणो से अपना घर फिर भी नहीं बना पाते हैं। कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है और वह स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं।* *बहुत से अपनी मेहनत से एक से अधिक संपत्ति बनाने में कामयाब हो जाते हैं। जन्म कुंडली के ऎसे कौन से योग हैं जो मकान अथवा भूमि अर्जित करने में सहायक होते हैं, उनके बारे में आज इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेगें।* *स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है, तभी व्यक्ति घर बना पाता है।* *मंगल को भूमि का और चतुर्थ भाव का कारक माना जाता है, इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए।मंगल का संबंध जब जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी खुद की प्रॉपर्टी अवश्य बनाता है।* *मंगल यदि अकेला चतुर्थ भाव में स्थित हो तब अपनी प्रॉपर्ट...

शिवलिंग के ऊपर बांधी जाने वाली मटकी को क्या कहते हैं, इसे कब और क्यों बांधते हैं?

*हम कई बार शिवलिंग के ऊपर एक मटकी बंधी हुई देखते हैं, जिसमें से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। ये दृश्य अक्सर गर्मी के दिनों में देखने को मिलता है। इस परंपरा से जुड़ी कई बातें हैं, जिसके बारे में  जानना बहुत आवश्यक है।* *इन दिनों वैशाख मास चल रहा है, जो 5 मई तक रहेगा। इस महीने में शिवलिंग के ऊपर एक पानी से भरी मटकी बांधने की परंपरा है। इस मटकी से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। वैशाख मास में ही ऐसा क्यों किया जाता है और इस परंपरा का क्या महत्व है। इससे जुड़ी कई कथाएं और मान्यताएं हमारे समाज में प्रचलित हैं। आज हम आपको इसी परंपरा से जुड़ी खास बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है…* *क्या कहते हैं इस मटकी को?*  *शिवलिंग को ऊपर जो पानी से भरी मटकी बांधी जाती है, उसे गलंतिका कहा जाता है।* *गलंतिका का शाब्दिक अर्थ है जल पिलाने का करवा या बर्तन। इस मटकी में नीचे की ओर एक छोटा सा छेद होता है जिसमें से एक-एक बूंद पानी शिवलिंग पर निरंतर गिरता रहता है। ये मटकी मिट्टी या किसी अन्य धातु की भी हो सकती है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि इस मटकी का पानी खत्म न हो।*  *...

शिवलिंग के ऊपर बांधी जाने वाली मटकी को क्या कहते हैं, इसे कब और क्यों बांधते हैं?

*हम कई बार शिवलिंग के ऊपर एक मटकी बंधी हुई देखते हैं, जिसमें से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। ये दृश्य अक्सर गर्मी के दिनों में देखने को मिलता है। इस परंपरा से जुड़ी कई बातें हैं, जिसके बारे में  जानना बहुत आवश्यक है।* *इन दिनों वैशाख मास चल रहा है, जो 5 मई तक रहेगा। इस महीने में शिवलिंग के ऊपर एक पानी से भरी मटकी बांधने की परंपरा है। इस मटकी से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। वैशाख मास में ही ऐसा क्यों किया जाता है और इस परंपरा का क्या महत्व है। इससे जुड़ी कई कथाएं और मान्यताएं हमारे समाज में प्रचलित हैं। आज हम आपको इसी परंपरा से जुड़ी खास बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है…* *क्या कहते हैं इस मटकी को?*  *शिवलिंग को ऊपर जो पानी से भरी मटकी बांधी जाती है, उसे गलंतिका कहा जाता है।* *गलंतिका का शाब्दिक अर्थ है जल पिलाने का करवा या बर्तन। इस मटकी में नीचे की ओर एक छोटा सा छेद होता है जिसमें से एक-एक बूंद पानी शिवलिंग पर निरंतर गिरता रहता है। ये मटकी मिट्टी या किसी अन्य धातु की भी हो सकती है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि इस मटकी का पानी खत्म न हो।*  *...

पीपल के पेड़ को क्यू स्पर्स करना साहिये ??

"ब्रह्म पुराण" के 118 वें अध्याय* में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा मुझसे उनको कोई पीड़ा नहीं होगी। जो शनिवार को प्रातःकाल उठकर पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।' (ब्रह्म पुराण') . शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए "ॐ नमः शिवाय" का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है। (ब्रह्म पुराण) . हिंदू धर्म में पीपल का बहुत महत्व है। पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को 'कल्पवृक्ष' की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष ...

वैदिक ज्‍योतिष में धन-संपत्ति के योग कैसे बनते हैं.

भूमि के लिए मुख्य रूप से मंगल जिम्मेदार होता है भवन के लिए शुक्र की भूमिका अहम होती है संपत्ति के दो अर्थ होते हैं- भूमि और भवन. भूमि के लिए मुख्य रूप से मंगल जिम्मेदार होता है. निर्माण के लिए भी मंगल की भूमिका होती है, लेकिन भवन के लिए ज्यादातर शुक्र की भूमिका होती है. चतुर्थ भाव और इसका स्वामी भी संपत्ति के लिए महत्वपूर्ण होता है. कभी-कभी सप्तम भाव भी इसमें भूमिका निभाता है. मंगल, शुक्र, चतुर्थ और सप्तम भाव से कुल मिलाकर संपत्ति की स्थिति देखी जाती है. कब भूमि प्राप्त करने के योग बनते हैं? कुंडली में मंगल की स्थिति मजबूत होने पर ऐसे योग बनते हैं. इसके अलावा मंगल के चतुर्थ भाव या इसके स्वामी से सबंध होने पर और कुंडली में अग्नि तत्त्व की मात्रा मजबूत होने पर भी भूमि योग बनता है. मूलांक 01, 04, 08 या 09 होने पर ये योग बनता है. कब संपत्ति प्राप्त करने के योग बनते हैं? कुंडली में शुक्र और मंगल की स्थिति ठीक होने पर संपत्ति का योग बनता है. इसके अलावा शुक्र का संबंध चतुर्थ भाव से होने पर और शुक्र और चन्द्रमा का संबंध होने पर भी ये योग बनता है. कुंडली में पृथ्वी तत्व मजबूत होने पर और मूलांक ...

कैसे जीतें चुनाव, जानिए कुछ ज्योतिषीय उपाय

यदि आप लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा, जिला पंचायत, जनपद पंचायत, नगर पालिक निगम, ग्राम पंचायत, सोसायटी या अन्य किसी पद के लिए चुनाव लड़ने का सोच रहे हैं, तो यहां वास्तु एवं ज्योतिषानुसार कुछ ऐसी बातें बताई जा रही हैं जिसके बारे में आप शायद ही जानते होंगे। वास्तु और ज्योतिष के ये छोटे-छोटे टिप्स आप आजमाएंगे तो आपको चुनाव जीतने में किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा और आप अपने प्रतिद्वंद्वी को आसानी से हरा सकते हैं। अत: जानिए कुछ खास एवं महत्वपूर्ण उपाय...  1-अपराजिता स्त्रोत का पाठ करवाये।  2-बगलामुखी का अनुष्ठान करवाये।  3-शिव व देवी की उपासना करे। 4- पंडित जी से मिल कर सम्पुटित मन्त्रों व चौपाइयों का अनुष्ठान करवाये।  5हनुमान जी के पूछ पर लगे सिन्दूर को मस्तक पर धारण करे। अगले पन्ने पर राहुकाल में चुनावी सभा न करें...   राहुकाल में चुनावी सभा न करें : राहुकाल में सभी प्रकार के शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस काल में चुनावी सभा नहीं करें। राहुकाल में की गई चुनावी आमसभा विफल होती है। मतदाता के मन में भ्रांतियां फैलेंगी और प्रत्याशी एवं पार्टी के प्रति ...

ज्योतिष के ये 15 सच आपके लिए जानना है जरूरी

हर किसी की सलाह मानना हो सकता है हानिकारक अक्सर सही जानकारी के अभाव में सामान्यजन किसी के भी कहने पर ज्योतिषीय उपाय आजमाने लगते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि इस तरह के आजमाए गए उपाय कई बार हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं- 1. कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।   2 . कुंडली में गुरु दशम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो मंदिर निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है।  3. कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।   4 . बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि रुक सकती है।  5 . सप्तम/अष्टम सूर्य हो तो ताम्बे का दान नहीं देना चाहिए, धन की हानि होने लगेगी।  6. मंत्रोच्चारण के लिए शिक्षा-दीक्षा लेनी चाहिए क्योंकि अशुद्ध उच्चारण से लाभ की बजाय हानि अधिक होती है।   7. जब भी मंत्र का जाप करें उसे पूर्ण संख्या में करना जरूरी है।  8. मंत्र एक ही आसन पर, एक ही समय में सम संख्य...

जन्म कुंडली के कुछ विशिष्ट योग एवं इनका फल

बालारिष्ट योग👉 चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है। मृतवत्सा योग👉 पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है। छत्रभंग योग👉 राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती। आडम्बरी राजयोग👉 कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है। विधुत योग👉 लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता ह...

वैवाहिक जीवन में संघर्ष के कुछ विशेष

 ग्रहयोग –1. यदि कुंडली के सप्तम भाव मेंकोई पाप योग (गुरु–चांडाल योग, ग्रहण योग अंगारक योग आदि) बना हुआ हो तो वैवाहिक जीवनमें तनाव और बाधाएं उपस्थितहोती हैं।  2.यदि सप्तम भाव में कोई पापग्रह नीच राशि में बैठा हो तोवैवाहिक जीवन में संघर्ष कीस्थिति बनती है।  3.  राहु–केतु का सप्तम भाव मेंशत्रु राशि में होना भी वैवाहिकजीवन में तनाव का कारण बनताहै।.   4.यदि सप्तम भाव के आगे औरपीछे दोनों और और पाप ग्रह होतो यह भी वैवाहिक जीवन मेंबाधायें उत्पन्न करता है।  5. सप्तमेश का पाप भाव(6,8,12) में बैठना या नीच राशिमें होना भी वैवाहिक जीवन मेंउतार चढ़ाव  का कारण बनता है।  6.पुरुष की कुंडली में शुक्र नीचराशि (कन्या) में हो, केतु के साथहो, सूर्य से अस्त हो, अष्टम भावमें हो या अन्य किसी प्रकारपीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन मेंतनाव और संघर्ष उत्पन्न होता है।   7.स्त्री की कुंडली में मंगल नीचराशि (कर्क) में हो, राहु  शनि सेपीड़ित हो बृहस्पति नीचस्थ होराहु से पीड़ित हो तो वैवाहिकजीवन में बाधायें और वाद विवादउत्पन्न होते हैं।   8.पाप भाव (6,8,12) के...

मृत्यु होने से पहले एवं मृत्यु होते समय की अनुभूति

आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है,,ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाए रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट झेला होता है । अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिए शरीर के पांच प्राण  एक धनंजय प्राण को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरंभ कर देते है। यह प्राण आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिए सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है ।धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है । बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है । उसे बेचैनी होने लगती है,, घबराहट होने लगती है सारा शरीर फटने लगता है,,खून की गति धीमी होने लगती है सांस उखड़ने लगती है बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं । अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्छा आने लगती है चेतन ही आत्मा के होने का संकेत ...

गणेश जी का विवाह किस से और कैसे हुआ और उनके विवाह में क्या रुकावटें आई...?

भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र गणेश जी की पूजा सभी भगवानों से पहले की जाती है। प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले इन्हे ही पूजा जाता है। गणेश जी को गणपति के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह गणों के देवता है और इनका वाहन एक मूषक होता है। ज्योतिषी विद्या में गणेश जी को केतु के देवता कहा गया है। गणेश जी के शरीर की रचना माता पार्वती द्वारा की गई थी उस समय उनका मुख सामान्य था, बिल्कुल वैसा जैसा किसी मनुष्य का होता है। एक समय की बात है माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि उन्हें घर की पहरेदारी करनी होगी क्योंकि माता पार्वती स्नानघर जा रही थी। गणेश जी को आदेश मिला की जब तक पार्वती माता स्नान कर रही है घर के अंदर कोई न आए तभी दरवाज़े पर भगवान शंकर आए और गणेश ने उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, जिसके कारण शिव जी ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया। गणेश को ऐसे देख माता पार्वती दुखी हो गई तब शिव ने पार्वती के दुख को दूर करने के लिए गणेश को जीवित कर उनके धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया और उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया। गणेश जी का विवाह किस कारण नहीं हो पा रहा था 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰...

पूजा के बाद क्यों जरूरी है आरती ?

हमें आरती कैसे करना चाहिए क्या है आरती का महत्व आरती कितने प्रकार की होती है ? हिन्दू धर्म मे पूजा उपरांत आरती करने का विशेष महत्त्व है इसके बिना कोई भी पूजा पूर्ण नही मानी जाती मान्यता के अनुसार जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है। आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। याद कीजिए आरती की थाल में कौन कौन सी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। आपके दिमाग में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन जरूर आ गया होगा। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है। जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है। आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे...

आरती के बाद क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं मंत्र

किसी भी मंदिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मंत्रों का जप अनिवार्य रूप से किया जाता है, सभी देवी-देवताओं के मंत्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो निम्न मंत्र विशेष रूप से बोला जाता है l कर्पूरगौरं करुणावतारं     संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे     भवं भवानीसहितं नमामि।। इस मंत्र का अर्थ- इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ इस प्रकार है- कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले। करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं। संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं। भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं। सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है। मंत्र का पूरा अर्थ- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे हृदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है। आरती के बाद यही मंत्र क्य...

जुड़वां बच्चों की कुंडली होती है समान, फिर क्यों भविष्य में होता है अंतर ?

जुड़वां बच्चों के जन्म में कुछ समय का अंतर होता है। यह 3 से 12 मिनट का हो सकता है। ज्योतिष के अनुसार इतने समय में नक्षत्रों के स्वामी बदल जाने से बच्चों के भाग्य में भी अंतर हो जाता है। ‘ज्योतिष’ मुनष्य के भविष्य को ज्ञात करने वाली पद्धित मानी जाती है। इसलिए कहा जाता है कि जब तक भविष्य है तब तक ज्योतिष भी है। ज्योतिषियों से हर कोई भविष्य जानना चाहता है। लेकिन सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्न हैं कि ‘जुडवां बच्चों की कुंडली समान होने के बाद भाग्य में अंतर क्यों?’ कहा जाता है कि कर्म सिद्धांत के कारण भी जुड़वां बच्चों के भाग्य में अंतर होता है। क्योंकि व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। जुड़वां बच्चों पर भी यही बात लागू होती है। भले ही उनके जन्म समय में कुछ मिनट का अंतर होता है, लेकिन उनके द्वारा किए कर्म उन्हें अलग-अलग दिशाओं में ले जाते हैं। वास्तव में जुड़वां बच्चों की कुंडली महत्वपूर्ण विषय है। यदि प्रत्यक्ष रूप में देखा जाए तो दोनों की कुंडली समान लगती है और जन्म समय में भी बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है। फिर भी भाग्य में अंतर होने के कारण दोनों बच्चों के जीवन...

गौमूत्र रोगों पर कैसे विजयी होता है?

गौमूत्र रोगों पर कैसे विजयी होता है? (1). गोमूत्र में किसी भी प्रकार के कीटाणु नष्ट करने की चमत्कारी शक्ति है। सभी कीटाणुजन्य व्याधियाँ नष्ट होती है। (2). गोमूत्र त्रिदोष को सामान्य बनाता है अतएव रोग नष्ट हो जाते है। (3). गोमूत्र शरीर में यकृत (लीवर) को सही कर स्वच्छ खून बनाकर किसी भी रोग का विरोध करने की शक्ति प्रदान करता है। (4). गोमूत्र में सभी तत्व होते हैँ जो हमारे शरीर के आरोग्यदायक तत्वों की कमी की पूर्ति करते है। (5). गोमूत्र में कई खनिज खासकर ताम्र होता है जिसकी पूर्ति से शरीर के खनिज तत्व पूर्ण हो जाते है। स्वर्ण छार भी होने से बचने की यह शक्ति देता है। (6). मानसिक क्षोभ से स्नायु तन्त्र (नर्वस सिस्टम) को आघात होता है। गोमूत्र को मेध्य और ह्रद्य कहा गया है। यानि मष्तिष्क और ह्रदय को शक्ति प्रदान करता है। अतएव मानसिक कारणों से होने वाले आघात से ह्रदय की रक्षा करता है और इन अंगो को होने वाले रोगों से बचत है। (7). किसी भी प्रकार की औषधि की मात्रा का अतिप्रयोग हो जाने से जी तत्व शरीर में रहकर किसी प्रकार से उपद्रव पैदा करते है उनको गोमूत्र अपनी विषनाशक शक्ति से नष्ट कर रोगी को नि...

श्री जगन्नाथ जी का रहस्य

Image
भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ी तो उनका अंतिम संस्कार किया गया, उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया, लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था , उनका हृदय आज तक सुरक्षित है, जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है, ये बात बहुत कम लोगो को पता है! महाप्रभु का महा रहस्य सोने की झाड़ू से होती है सफाई....! महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है.... पुरी (उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है, मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया...! हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है, यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है,लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है,उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता...! मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और...